Shree Hari

 

 

 

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स्वामीजी का परिचय

स्वामीजी के विचार  - 1, 2, 3, 

अंतिम प्रवचन  (२९ जून, २००५ दोपहर बजे)

प्रार्थना

एक संत की वसीयत

स्वामीजी को लाखों प्रणाम

संत महिमा

 

|| श्री हरि: ||

 

स्वामीजीका जन्म वि.सं.१९६०(ई.स.१९०४)में राजस्थानके नागौर जिलेके माडपुरा गाँवमें हुआ था और उनकी माताजी नेवर्षकी अवस्थामें ही उनको संतोंकी शरणमें दे दिया था, आपने सदा परिव्राजक रूपमें सदा गाँव-गाँव, शहरोंमें भ्रमण करते हुए गीताजीका ज्ञान जन-जन तक पहुँचाया और साधु-समाजके लिए एक आदर्श स्थापित किया कि साधु-जीवन कैसे त्यागमय, अपरिग्रही, अनिकेत और जल-कमलवत् होना चाहिए और सदा एक-एक क्षणका सदुपयोग करके लोगोंको अपनेमेंलगाकर सदा भगवान्‌में लगाकर; कोई आश्रम, शिष्यबनाकर और सदा अमानी रहकर, दूसरोकों मान देकर द्रव्य-संग्रह, व्यक्तिपूजासे सदा कोसों दूर रहकर अपने चित्रकी कोई पूजाकरवाकर लोग भगवान्‌में लगें ऐसा आदर्श स्थापित कर गंगातट, स्वर्गाश्रम, हृषिकेशमें आषाढ़ कृष्ण द्वादशी वि.सं.२०६२ (दि. ३.७.२००५) ब्राह्ममुहूर्तमें भगवद्-धाम पधारेसंत कभी अपनेको शरीर मानते ही नहीं, शरीर सदा मृत्युमें रहता है और मैं सदा अमरत्वमें रहता हूँ-यह उनका अनुभव होता हैवे सदा अपने कल्याणकारी प्रवचन द्वारा सदा हमारे साथ हैंसंतोंका जीवन उनके विचार ही होता हैं |